जाएं भी तो कहाँ.....
ना ही कोई मंज़िल
ना ही कोई रस्ता
जिस पर ऐसे ही
चलती रहे ज़िंदगी|
ना ही कोई अपना
ना ही कोई पराया
जिसे इस दर्द को करूं साझा|
ना ही कोई उम्मीद की किरण
ना ही कोई आखों में कोई ख़्वाब
जिसके लिये कुछ पल जियूँ|
कुछ है....तो बस!
ये तन्हा दिल
जो बार-बार करता है सवाल
खुद से...
जाएं भी तो कहाँ.......
जाएं भी तो कहाँ......
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