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Monday, July 30, 2012

"प्रेम की आहट


एक आहटों का झोका कुछ आ रहा ऐसे
मंद -मंद तन पे वो छा रहा हो जैसे
उलझने अजीब सी घूम -घूम आती
मै दूर जाऊ उनसे वो पास से बुलाती
जल उर्मिकाओं जैसी देती है मन को ठोकर
दिल में रह जाता जैसे कुछ होकर
कुछ नीले पुष्प मुझको पास दिख रहे हैं
पर जाने क्यूँ कुछ कहने से डर रहे है
वो कौन जो मुझको यूँ सता रहा है
सामने तो आ जरा नज़रे तो मिला
गर दिल तेरा कुछ कह रहा है
 कुछ कह रहा है ................ 


Sunday, July 29, 2012

.".जिन्दगी की सार्थकता "

भौतिक सपने की चाहत और फिर उसका पूरा हो जाना ही , जिन्दगी के सार्थकता को परिभाषित नही कर सकता | जिन्दगी का दायरा इतना बड़ा है कि भौतिकता की तमाम चीजे प्राप्त कर लेने के बाद भी बहुत कुछ खाली रह जाता है |इसी खालीपन को जानना ,समझना और फिर उसे भरना जिन्दगी को सार्थक बनती है ............".जिन्दगी की सार्थकता "

ग़ज़ल

दिल -ए -चाहत न पूरा हो .तो कोई बात नही 
दिल -ए -राहत न भी मिले तो कोई बात नही 
गर इश्क हो तो सिर्फ तेरे रूह -ए - नूर का 
वरना महरूम -ए इश्क रहूँ तो कोई बात नही 
दिल -ए चाहत .........................................
फासले बढे तो मेरे और मेरी सासों के बीच 
वरना जिन्दगी रहे या न रहे कोई बात नही 
 दिल -ए -चाहत .....................................

Saturday, July 28, 2012

"क्या उत्तेजक परिधान महिलाओं के प्रति यौन हिंसा का कारण है ?"

 बदलते  समाज में परिधान का महत्त्व केवल तन ढकने मात्र तक नही रह गया है ।वास्तव में अब यह फैशन का रूप ले चुका है ,जिसमे बाजारवाद की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।।अब हर कोई, जिसके पास पर्याप्त संसाधनों तक पहुँच है ,वो समाज में विशिष्ट दिखना चाहता है।वैसे भी सुन्दर दिखने की चाहत हर एक की होती है ,और यह बात महिलाओं में अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा होती है ।रहा सवाल महिलाओं के प्रति यौन हिंसा ,उनके उत्तेज़क कपडे पहनने से होता है तो ऐसा  कहना हमारी राय में अतार्किक है ,क्योंकि अभी तक महिलाओं के प्रति यौन हिंसा का कारण उनका उत्तेजक परिधान कभी नही रहा है ,बल्कि सीधी- सरल महिलाऐं ,जो आमतौर पर साधारण कपडे पहनती है वो इस कुकृत्य का ज्यादा शिकार होती रही हैं ।अत : मेरा मानना है की इस तरह के अतार्किक सवाल उठाकर न केवल हम अपनी  जिम्मेदारिओं से विमुख हो रहे हैं बल्कि उन लोगो का मनोबल भी बढ़ा रहें हैं जो इस कुकृत्य को अंजाम दे रहें हैं।.............

Saturday, July 14, 2012

भटक जातें हैं जो मंजिल के रास्ते
अक्सर ! ढूढते हैं वही नये रास्ते .........

positive way

भटक जातें हैं जो मंजिल के रास्ते
अक्सर ! ढूढते हैं वही नये रास्ते .........

my view

"हमसे ज्यादातर लोगों की ईमानदारी वही तक होती है ,जहाँ तक इसके लिए हालात गवाही देता है | जैसे ही विपरीत हालत उत्पन्न होतें हैं हम ईमानदारी का दामन छोड़ कर उस रस्ते पे चलने लगते है जिसके लिए हमारा वजूद गवाही नही देता |"