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Friday, August 24, 2012

"ग़ज़ल "



चाहतों का सिलसिला बड़े ,तो कुछ बात हो
दिलों की नजदीकियां बड़े, तो कुछ बात हो
खिलने लगी हैं उमंगे मन की गहराइयों में
पर उमंगे जवां हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................
छुपे चेहरे की नजाकत को समझना मुश्किल
नज़रों से नजरों का दीदार हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .............................

यूँ ही ख्यालों में सताना अच्छा नही
दिलों का तीर आर-पार हो, तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................

"ग़ज़ल "

बेरुखी में इस तरह ना ठुकराओ मुझे
चाहतों का मोम हूँ , पिघलाओ मुझे
धडकनों में नज़र आयेगी तस्वीर तुम्हारी
अपने दिल का आइना, बनाओ मुझे
बेरुखी में इस .....................................
समंदर,अश्कों का बन जायेगा एक पल में
तह -ऐ -दिल से अपने, रुलाओ मुझे
बेरुखी में इस .................................
गर खता है मेरी तुझसे इश्क करना
रूह-ऐ-नूर से पूछकर, बताओ मुझे

बेरुखी में इस ......................................
गिरा लूगां खुद को खुद की नज़र में
नज़र से नज़र मिलाकर, दिखाओ मुझे
बेरुखी में इस ................................

"समझ का विस्तार "

विश्वास,एक आत्मनिष्ठ धारणा होती है,जिसको हम अपनी समझ और विचारों की सीमा के आधार पर निर्मित और विकसित करते हैं | प्राय: जब किसी के प्रति घनिष्ठ विश्वास कायम हो जाता है तो हम ये मानकर चलतें है कि हम उसको अच्छी तरीके से समझ गये हैं |किन्तु अचानक किसी घटना के बाद और उसके पूर्व तमाम घटनाक्रमों का अनुभव आपको यह एहसास दिलाता है कि वो व्यक्ति ,जिस पर आप विश्वास कर रहे थे ,.वास्तव में वह आपके विश्वास का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा था |आप इस विश्वासघात के कारण व्यथित हो जायेगे |किन्तु हमारी राय में ऐसा करना उचित नही है,क्योंकि ये विश्वास आपकी अपनी समझ का प्रतिफल था,वस्तुत:आपको अपनी समझ को और परिपक्व बनाने की तरफ ध्यान देना चाहिए |

"चुनौती"

भावनाएं व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा होतीं हैं |जब ये किसी के प्रति आत्मीयता के साथ उमड़ती हैं तो ,उनको हमारा विवेक नियंत्रित करने में नाकाम रहता है |इसका कारण यह होता है कि.जब भावनाएं आत्मप्रेम से परिपूर्ण होतीं हैं तो वे अत्यंत सरल और पवित्र होती हैं ,जिस कारण हमारा विवेक ,जो कि जटिलता को समझने का जरिया है ,वो हमारी इस पवित्र आत्मप्रेम कि सरलता को समझ ही नही पाता है |यह हमारी भावना और विवेक का अजीब विरोधाभास है |इसको समझना और इससे पार होना हमारे व्यक्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती है|

"विडम्बनाएँ "

कितनी विडम्बनाओं से भरा है
आदमी का मन
किसी की इच्छाएं है
सातवें आसमान पार पहुचने की
तो किसी के पग रहना चाहते है
सदैव धरा पर
कोई चाहता है
पी लूं आदमी का ही खून
रंज-ऐ -गम में
तो कोई लुटा देना चाहता है

जिंदगी ही अपनी
किसी के प्यार में
कितनी विडम्बनाओं से भरा है
आदमी का मन..........

"समझ की संभावनाएं "

"प्राय:हम लोग,किसी व्यक्ति या विषय को अपने अनुभव,आवश्यकता और अपनी सुविधा के अनुपात में समझते है |यह हमारे समझ की सीमा होती है,किन्तु इस सीमा के बाहर भी समझ की अनंत संभावनाएं होती है ,जिनको हम, या तो समझते नही है या समझने की कोशिश ही नही करते हैं |प्राय:हम अपनी सीमित समझ के आधार पर  ये धारणा बना लेते हैं कि हमने उस व्यक्ति या विषय को सम्पूर्णता में समझ लिया है |जब कि वास्तव में उस विषय या व्यक्ति को समझने वाले न केवल हमसे बेहतर हो सकते हैं बल्कि हमसे भिन्न भी |वस्तुत: इस तरह कि धारणा न केवल अपूर्ण है,बल्कि हम अपनी समझ की अनंत संभावनाओं को सीमित करते हुए अपने आपको 'कूपमंडूपकम 'की स्थिति में लेकर चले जाते हैं |""समझ की संभावनाएं "

Saturday, August 4, 2012

"ग़ज़ल



चाहतों का सिलसिला बड़े ,तो कुछ बात हो
दिलों की नजदीकियां बड़े, तो कुछ बात हो
खिलने लगी हैं उमंगे मन की गहराइयों में
पर उमंगे जवां हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................
छुपे चेहरे की नजाकत को समझना मुश्किल
नज़रों से नजरों का दीदार हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .............................
यूँ ही ख्यालों में सताना अच्छा नही
दिलों का तीर आर-पार हो, तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................