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Wednesday, November 17, 2010

"हसीन दर्द"

  जब कभी तुम्हारी ज़िन्दगी 
  तुमसे दूर चली जाय
  बहुत दूर .........
  तब तुम महसूस करो
  उस दर्द को
  जो देता है सुकून
  दिल को
  यकीं है
  लौट आएगी ज़िन्दगी
  तुम्हारी बाँहों में
   ...................

कभी-कभी

कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसा पल भी आता है, जब यह महसूस होता है कि ज़िन्दगी पूरी तरह से बिखर जाएगी, पता ही नहीं रहता कि अब आगे क्या होगा, जैसे लगता है चारो तरफ घनघोर अँधेरा छा गया है और फिर  डर लगने लगता है कि कहीं इस अँधेरे में खो न जाऊं,लेकिन अचानक ही कहीं  से कोई किरण आती है और एक उजाला छाने लगता है,  और फिर एक नये उमंग का संचार होता है |प्राय: ऐसा तब होता जब पढ़ते-पढ़ते अचानक बोर हो जाता हूँ |

Sunday, November 14, 2010

"इस दुनिया को ठुकरा कर ओ जाने वाले जरा ठहरो !इस दुनिया में हर एक साज़ मौजूद है जरा छेड़ कर तो देखो प्यार के तराने न बन जय तो कहना "....

Friday, October 22, 2010

अर्धांगिनी

समां जाये ऐसे जैसे मिल जाती हैं
दो धाराएं एक-दूसरे में

 मुस्कुराएँ मेरे  होंठों से उनके लिए
 हो गये हैं उदास इस जहाँ से

सुने मेरे कानो उन आहटों को
न सुन पाता है जिसे और  कोई

 देखे मेरी आँखों उस तस्वीर को
जो हो गयी  हैं धुधली अपने अस्तित्व के लिए

महसूस करे उन संवेदनाओं को
जो सुप्त हो गयी हैं इक रोटी के लिए

बढ़े मेरे कदमों से उनके लिए
 जो हो गये हैं त्रस अपनी अदृष्ट की वज़ह से

 दे मुझे वो पवित्रता की ऐसी ज्योति कि
 बना दूं अमावस की निशा को भी चांदनी
काश ऐसी हो मेरी अर्धांगिनी

आस

 तलाश है  ऐसे इक नज़र की
 प्यास है ऐसे  इक  ज़हर की
 भूल जाऊ   वो   गम-ए-शाम
 आस है ऐसे  इक  सहर  की..........

परिवर्तन

'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना से विमुख होकर वैश्विक ग्राम के रूप में परिवर्तित हो रहा हमारा समाज, भौतिकवाद  की अंधी दौड़ में धुल-धूसरित हो रहे हमारे नैतिक मूल्य,भूमंडलीकरण की प्रचंड लहर में गुम हो रही  हमारे गावों की सांस्कृतिक पहचान  ,खुद अपना ही पता पूछते हुए भटक रहें लोग , बाजारवाद का यह कैसा उत्सव जिसके पांवों तले रौंदे जा रहें हम ..............

"वो औरत"

 
वो औरत ,जो करती है दिनभर
जी-तोड़ मेहनत ,ईट के भट्ठे पर
शायद माँ बनने वाली है

फिर भी ढो रही है सिर पर ईटों का भार
नहीं है परवाह उसे प्रसव पीड़ा का
क्योंकि डर है कहीं छिन न जाये
उसकी मजदूरी

एक दिन कहीं किसी कोने में
देगी जन्म बच्चे को
और पिलाएगी दूध
और फिर !
 
फटे साड़ी के चिथड़ो में लपेटकर
बोरे का झूला बनाकर
 देगी टांग बच्चे को
किसी डाल के सहारे

और फिर !
निकल पड़ेगी
अपने काम पर




सर्वेश
 

"प्लास्टिक की चिड़िया "

 
गांवों में
सड़क के किनारे

बिज़ली के खम्भों पर
बैठे कबूतरों का झुण्ड

तरकुल के पेड़ पर
बैठे गिध्धों का झुण्ड

सिचाई के दौरान , खेतों के ऊपर
आसमान में उड़ते, बगुलों का झुण्ड

रेत - भरी धुल में , खेलते
गौरैया चिड़ियों की चहचहाहट

बरसात के मौसम में
मेढकों की टरटराहट

पीपल के पेड़ पर
रात के अन्धेरें में
जुगनुओं की जगमगाहट

और भी जाने कितने
अनुपम ,अद्वितीय मनभावन दृश्य

देखा करता था
तब नहीं था अनुमान

कि! ये सभी दृश्य
हो जायेगें विलुप्त , एक दिन

अन्यथा ! कैमरे में कैद कर
उतार लेता उनकी तस्वीर

और दिखाता
आने वाली पीढ़ियों को

कहता देखो
ज़रा गौर देखो

ये है तुम्हारा अतीत
जिसकी कीमत पर , दिया है तुझे

कभी न विलुप्त होने वाली
" प्लास्टिक की चिड़िया "

प्रश्न

दोस्तों ,जिंदगी की गहरे दर्द और प्रकृति की हसीन वादियों में एक गहरा रिश्ता होता है ,क्या कभी आपने इस रिश्तें को महसूस किया है ?  .............

"किसी की याद"

जब किसी की याद
अल्हण झरने की लापरवाह रवानी
जिंदगी की सच्चाई जैसा खुदरापन
और बहुत  दिन पहले चुभे किसी कांटे की
रह-रहकर उठने वाली टीस सा महसूस होने लगे
तो समझ लीजिये कोई आपका चाहने वाला ,आप को भी
याद कर रहा है ...........

Thursday, October 21, 2010

BEAUTY OF NATURE

सफ़लता का मूल मंत्र

"आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते जाओ "

पानी बचाओ

जल ही जीवन है

जरा!विचार करें

भौतिकता की तमाम वस्तुएं उपलब्ध करा दी जाय मसलन टी .वी. , मोबाइल, कंप्यूटर ,कार  वगैरह -वगैरह, यदि इस  शर्त पर कि  आपको रोटी नहीं दी जाएगी तो क्या इन वस्तुओं की कोई उपयोगिता रह जाती है ?.....

"प्रकृति की यादों में "

"  आप और हम मिलकर यदि कुछ पल के लिए यह महसूस कर  लें कि प्रकृति माँ हम  सभी  उसकी संतान तो निश्चित तौर पर पर्यावरण-संरक्षण कि दिशा में एक ठोस पहल हो सकती है."  .... .........

समय

 दोस्तों , जिंदगी की राहों में चलते हुए अभी तक मैंने जो अनुभव पाया  है उसे अगर मैं दो वाक्यों में कहना चाहूं तो ,पहला यह कि " सही  समय कि पहचान करना बहुत जरूरी है "तथा दूसरा, "समय का सदुपयोग जिंदादिली के साथ करना " समय की महत्ता को समझना ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी है.........

"अबे !छोटू "

isarvesh tripathi
हम भी करतें है
आवाज़ बुलंद
लगा देते हैं
तर्कों की झड़ी
सम्मेलनों ,संगोष्टियों में
बाल-मजदूरी के खिलाफ

किन्तु होते ही शाम
पहुंचतें हैं दोस्तों के साथ
जब किसी चाय की दूकान पर
तो कहना पड़ता है

"अबे !छोटू "
ज़रा चार चाय और
चार समोसे ला
................

"कफन "

संसार की
सम्पूर्ण सम्पदा को
समेटकर
बिछा लो
अपने कदमो में

तो भी तुम
चाहकर
कितना भी प्रयास कर लो
नहीं लेकर जा पाओगे
मंजिल तक इसे

क्योंकि पहनकर जाओगे
जिस कपडे को तुम
कोई जेब ही नहीं है उसमे
.............

"एक आवाज "

ये नीला आकाश
ये समुद्र की लहरें

ये पर्वतों की विशालता
ये चिड़ियों की चहचहाहट

ये फूलों की सुगंध
ये बारीश की बूँदें

ये नदियों का प्रवाह
ये बर्फ की चादरें

ये सब
कुछ कह रहें है
आप से

पल -भर को
सुन लें इनकी आवाज

नहीं तो ये
हो जायेंगी खामोश
सदा के लिए
... ...........
 

"नज़र"

sarvesh tripathi

मै ढूढता हूँ
एक ऐसी नज़र
जिससे देख सकूं
अपनी ही तबाही का
वो मंज़र
जिसे मैंने
खुद चित्रित किया था
अपनी ही नज़रों से छुपाकर
..........

" माँ "

धरा की वह
ऐसी धरोहर
जो मिलती है
सबको
जीवन में
एक बार

है उसके उत्संग में
इतना वात्सल्य प्रेम -रस
कि भर दे
सम्पूर्ण जलधि को

है उसमे पवित्रता की
ऐसी ज्योति
कि कर दे आलोकित
सूर्य को भी भी

है प्रबल त्याग की
ऐसी भावना
कि कर दे न्योछावर
सर्वस्य जीवन
ममत्व के लिए

धरा की वह अमूल्य धरोहर
नाम है जिसका माँ

"कुछ यादें "

कुछ यादें
बहुत खास होती है

जी चाहता है
इन्हें लफ़्ज़ों में समेटकर
कोई ग़ज़ल बना दूं

पर अफ़सोस
हर बार
असफल हो जाता हूँ

शायद!
इन्हें लफ़्ज़ों में
बयाँ होना गवांरा नहीं

गुज़रा हुआ इश्क

गुज़रा हुआ इश्क
याद आता है
जब कभी

भूल जाता हूँ
मेरी मंजिल
कहाँ है


आती है खामोशियाँ
आहिस्ता -आहिस्ता
दर्द उठता है
इक लख्त
सीने में

तन्हाई हो जाती है
और भी गहरी
टूट जाता है दिल
फिर से

भौतिकता

अधिकांश लोग साधारण जीवन के व्यवहार में स्वाभाविक तथा अचेतन रूप से भौतिकवादी होते हैं। वे ज़िंदगी के भौतिक पक्ष से भली-भांति परिचित होते हैं और अपने दैनन्दिनी कार्यकलापों में भौतिक सिंद्धांतों से परिचालित होते हैं। यह बात दीगर है कि जब जीवन से जुड़ी जिन चीज़ों में अनिश्चितता या असुरक्षा शामिल हो जाती है, तब वे पारंपरिक रूप से प्राप्त अपनी समझ के हिसाब से अध्यात्मवादी चिंतन का सहारा लेते हैं।वास्तव में जब तक व्यक्ति भौतिकता कि प्रचंड लहर में प्रवाहित होता रहता है, तब तक उसे अपनी आत्मा कि आवाज सुनाई नही देती या बहुत अस्पष्ट सुनाई देती है I

‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण

‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण' का मतलब किसी एक पक्ष के साथ जड़ता से बंधना नहीं होता, वरन वस्तुगतता का सापेक्ष, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की योग्यता पैदा कर सकने वाले नज़रिए से होता है।किसी भी दृष्टिकोण या सिद्धांत का असली परीक्षण, व्यवहार के जरिए ही हो सकता है। यही इसकी कसौटी होती है कि वह प्रकृति और जीवन की वास्तविक परिघटनाओं को कितनी सटीकता और accuracy के साथ समझाने की सामर्थ्य रखता है। उसका सामान्यीकरण किया जा सकता है या नहीं? प्राप्त निष्कर्षों और नियमसंगीतियों से उसके जरिए भावी परिघटनाओं या संबंद्ध अन्य प्रक्रियाओं को नियत किया जा सकता है या नहीं?वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथ्यों ,घटनाओं इत्यादि को समझने का तार्किक एंव व्यावहारिक दृष्टिकोण है I

नैतिकता

पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति स्वाभाविक आकर्षण में ह्रास होना वर्तमान परिदृश्य में एक गंभीर  समस्या है .और इस समस्या का मूल कारण, कहीं न कहीं हमारी नैतिकता से दूर होने की प्रवृति है ..नैतिक मूल्यों के साथ जीने में इन्सान  इतना मर्यादित रहता है कि उसे किसी के प्रति उसकी क्या नैतिक जिम्मेदारियां है इसका भलीभांति ज्ञान रहता है ......

Wednesday, October 20, 2010

इन्तज़ार

ख़ामोशियों में भी कुछ शोर रहता है

और परछाइयों के पीछे

कोई आहट दिल-ओ-दिमाग़ में


दूर-दूर तक फैली है तन्हाई

फिर भी, गुज़रे वक़्त का इन्तज़ार रहता है,

कोशिशें नाकाम हज़ार बार कीं

ख़ुद को समझाने की

कोई रहनुमा नहीं जो सम्भाले हालात को।

फिर किस इन्तज़ार में

ये चन्द साँसें चल रही हैं    

"तन्हाई "

तन्हाई एक अजीब सी ख़ामोशी है
जिसमे सुनाई देती है
अपनी ही आवाज

किसी की यादों में

तुम्हारे यादों के कुछ लम्हें
अभी भी मुझे बेचैन करते हैं

 तुम्हारे मोहब्बत की खुशबू
अभी भी महकती है
 मेरे दिल के फिजाओं में

तुम्हारे शरारतों के कुछ हसीन जख्म
अभी भी दर्द करते हैं
मेरे सीने में 

 तुम्हारे गीतों के झंकार
अभी भी गूंजते हैं
 मेरे कानों में

अभी भी डर लगता है
 कही भर न लो अपनी आगोश में
और मैं हो जाऊं  घायल 
तुम्हारी  उन शोख अदाओं से
 जिन पर मैं मरता था
...........................

मेरे बचपन के

मेरे बचपन के
कुछ लम्हे
अभी भी
सुकून देते हैं
मुझे
कुछ नादानियाँ
अभी भी
बरक़रार है
जेहन में मेरे
जिनकी बदौलत
मुस्कुरा लेता हूँ
तमाम झंझावतों के बीच

...............................

ग़जल

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो


वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो


मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो


ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो


कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम कर
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो


मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो
               बशीर बद्र

ग़जल

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में

और जाम टूटेंगे, इस शराबख़ाने में
मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में



फ़ाख़्ता की मजबूरी ,ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है, उसके आशियाने में

दूसरी कोई लड़की, ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है, उसको भूल जाने में 

                बशीर बद्र

हकीकत

"खुद से उलझनों को सुलझाना सिख लो यारों
 बेमतलब की मेहरबानियाँ मिलती है कहाँ "............

"प्रश्न "

शहर की सुबह होते ही
कुछ छोटे -छोटे बच्चे
निकलते हैं जब
कूड़े के ढेर से
गंदे पोलीथिन के
टुकड़े बीनने

और आप का बच्चा
तोड़ देता है
कीमती खिलौने
पल -भर में

तब आप को
कैसा लगता है
ज़रा फुरसत में
सोच के बताइगा

...........................
सर्वेश त्रिपाठी
.......................

गीत

आंसुओं से ख़ुशी के दीप जलाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा

मंजिल सीधे रास्तों से मिलती है
इसी सोच में हर कदम बढ़ाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा

इमां दुरुस्त रहने पे चोट मिलतो ज़ुरूर
इस बात से कभी न घबराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा

दर्द ही देता है खुशी के मायने
इसलिए सदा दर्द को अपनाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा

उलझन मे गुजारता था जिंदगी अपनी
पर दूसरों के उलझन सुलझाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा 

          सर्वेश त्रिपाठी

"गीत"

इश्क की राहों में यूँ ही अकेला छोड़ दिया
इक रहम दिल को किसी ने तोड़ दिया

सीधी राहों से गुजरने की हुई थी तमन्ना
किसी ने हर इक राहों को मोड़ दिया
इश्क की राहों में यूँ ही अकेला छोड़ दिया

पत्थरों से बनाया था इश्क का जो महल
शीशे के टुकड़े से किसी ने तोड़ दिया
इश्क की राहों में यूँ ही अकेला छोड़ दिया
...........................................................

             सर्वेश त्रिपाठी
......................................................

स्वाभिमान

मै झूकूगां नही
मै झूकूगां नही

यह क्षोभ भी आप्त है
समय बहुत पर्याप्त है
अनंत बाधा भी तो क्या
मै रूकूगां नहीं
मै झूकूगां नही

आमर्ष अनुराग के लिए
निज प्यास के लिए
मिले अमिय भी तो क्या
मै पियूगां नही
मै झूकूगां नही

लोक में परलोक में
कभी नहीं विलोक में
मिले निर्जर भी तो क्या
मै कहूगां नहीं
मै झूकूगां नही
............

"दिल की आवाज से प्यार करो"

" इस दुनिया को ठुकराकर ओ जाने वाले जरा ठहरो !इस दुनिया में  हर इक साज़ मौजूद है ,जरा छेड़ कर तो देखो प्यार के तराने न बन जय तो कहना "...!!!
                                                                                              सर्वेश त्रिपाठी