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Thursday, December 27, 2012

क्या करूँ  …?
कभी -कभी ,
दिल के दर्द का  भारीपन  …
जिन्दगी  को 
इस  हद  तक  
दबाता है ,
मानो . . दर्द ,
जिन्दगी से बड़ा हो गया  हो ,
और तब …. जिन्दगी ,
अपने अस्तित्व के लिए 
मिटा देना चाहती ,
अपना  ही अस्तित्व 



Friday, August 24, 2012

"ग़ज़ल "



चाहतों का सिलसिला बड़े ,तो कुछ बात हो
दिलों की नजदीकियां बड़े, तो कुछ बात हो
खिलने लगी हैं उमंगे मन की गहराइयों में
पर उमंगे जवां हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................
छुपे चेहरे की नजाकत को समझना मुश्किल
नज़रों से नजरों का दीदार हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .............................

यूँ ही ख्यालों में सताना अच्छा नही
दिलों का तीर आर-पार हो, तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................

"ग़ज़ल "

बेरुखी में इस तरह ना ठुकराओ मुझे
चाहतों का मोम हूँ , पिघलाओ मुझे
धडकनों में नज़र आयेगी तस्वीर तुम्हारी
अपने दिल का आइना, बनाओ मुझे
बेरुखी में इस .....................................
समंदर,अश्कों का बन जायेगा एक पल में
तह -ऐ -दिल से अपने, रुलाओ मुझे
बेरुखी में इस .................................
गर खता है मेरी तुझसे इश्क करना
रूह-ऐ-नूर से पूछकर, बताओ मुझे

बेरुखी में इस ......................................
गिरा लूगां खुद को खुद की नज़र में
नज़र से नज़र मिलाकर, दिखाओ मुझे
बेरुखी में इस ................................

"समझ का विस्तार "

विश्वास,एक आत्मनिष्ठ धारणा होती है,जिसको हम अपनी समझ और विचारों की सीमा के आधार पर निर्मित और विकसित करते हैं | प्राय: जब किसी के प्रति घनिष्ठ विश्वास कायम हो जाता है तो हम ये मानकर चलतें है कि हम उसको अच्छी तरीके से समझ गये हैं |किन्तु अचानक किसी घटना के बाद और उसके पूर्व तमाम घटनाक्रमों का अनुभव आपको यह एहसास दिलाता है कि वो व्यक्ति ,जिस पर आप विश्वास कर रहे थे ,.वास्तव में वह आपके विश्वास का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा था |आप इस विश्वासघात के कारण व्यथित हो जायेगे |किन्तु हमारी राय में ऐसा करना उचित नही है,क्योंकि ये विश्वास आपकी अपनी समझ का प्रतिफल था,वस्तुत:आपको अपनी समझ को और परिपक्व बनाने की तरफ ध्यान देना चाहिए |

"चुनौती"

भावनाएं व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा होतीं हैं |जब ये किसी के प्रति आत्मीयता के साथ उमड़ती हैं तो ,उनको हमारा विवेक नियंत्रित करने में नाकाम रहता है |इसका कारण यह होता है कि.जब भावनाएं आत्मप्रेम से परिपूर्ण होतीं हैं तो वे अत्यंत सरल और पवित्र होती हैं ,जिस कारण हमारा विवेक ,जो कि जटिलता को समझने का जरिया है ,वो हमारी इस पवित्र आत्मप्रेम कि सरलता को समझ ही नही पाता है |यह हमारी भावना और विवेक का अजीब विरोधाभास है |इसको समझना और इससे पार होना हमारे व्यक्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती है|

"विडम्बनाएँ "

कितनी विडम्बनाओं से भरा है
आदमी का मन
किसी की इच्छाएं है
सातवें आसमान पार पहुचने की
तो किसी के पग रहना चाहते है
सदैव धरा पर
कोई चाहता है
पी लूं आदमी का ही खून
रंज-ऐ -गम में
तो कोई लुटा देना चाहता है

जिंदगी ही अपनी
किसी के प्यार में
कितनी विडम्बनाओं से भरा है
आदमी का मन..........

"समझ की संभावनाएं "

"प्राय:हम लोग,किसी व्यक्ति या विषय को अपने अनुभव,आवश्यकता और अपनी सुविधा के अनुपात में समझते है |यह हमारे समझ की सीमा होती है,किन्तु इस सीमा के बाहर भी समझ की अनंत संभावनाएं होती है ,जिनको हम, या तो समझते नही है या समझने की कोशिश ही नही करते हैं |प्राय:हम अपनी सीमित समझ के आधार पर  ये धारणा बना लेते हैं कि हमने उस व्यक्ति या विषय को सम्पूर्णता में समझ लिया है |जब कि वास्तव में उस विषय या व्यक्ति को समझने वाले न केवल हमसे बेहतर हो सकते हैं बल्कि हमसे भिन्न भी |वस्तुत: इस तरह कि धारणा न केवल अपूर्ण है,बल्कि हम अपनी समझ की अनंत संभावनाओं को सीमित करते हुए अपने आपको 'कूपमंडूपकम 'की स्थिति में लेकर चले जाते हैं |""समझ की संभावनाएं "

Saturday, August 4, 2012

"ग़ज़ल



चाहतों का सिलसिला बड़े ,तो कुछ बात हो
दिलों की नजदीकियां बड़े, तो कुछ बात हो
खिलने लगी हैं उमंगे मन की गहराइयों में
पर उमंगे जवां हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................
छुपे चेहरे की नजाकत को समझना मुश्किल
नज़रों से नजरों का दीदार हो ,तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .............................
यूँ ही ख्यालों में सताना अच्छा नही
दिलों का तीर आर-पार हो, तो कुछ बात हो
चाहतों का सिलसिला .........................

Monday, July 30, 2012

"प्रेम की आहट


एक आहटों का झोका कुछ आ रहा ऐसे
मंद -मंद तन पे वो छा रहा हो जैसे
उलझने अजीब सी घूम -घूम आती
मै दूर जाऊ उनसे वो पास से बुलाती
जल उर्मिकाओं जैसी देती है मन को ठोकर
दिल में रह जाता जैसे कुछ होकर
कुछ नीले पुष्प मुझको पास दिख रहे हैं
पर जाने क्यूँ कुछ कहने से डर रहे है
वो कौन जो मुझको यूँ सता रहा है
सामने तो आ जरा नज़रे तो मिला
गर दिल तेरा कुछ कह रहा है
 कुछ कह रहा है ................ 


Sunday, July 29, 2012

.".जिन्दगी की सार्थकता "

भौतिक सपने की चाहत और फिर उसका पूरा हो जाना ही , जिन्दगी के सार्थकता को परिभाषित नही कर सकता | जिन्दगी का दायरा इतना बड़ा है कि भौतिकता की तमाम चीजे प्राप्त कर लेने के बाद भी बहुत कुछ खाली रह जाता है |इसी खालीपन को जानना ,समझना और फिर उसे भरना जिन्दगी को सार्थक बनती है ............".जिन्दगी की सार्थकता "

ग़ज़ल

दिल -ए -चाहत न पूरा हो .तो कोई बात नही 
दिल -ए -राहत न भी मिले तो कोई बात नही 
गर इश्क हो तो सिर्फ तेरे रूह -ए - नूर का 
वरना महरूम -ए इश्क रहूँ तो कोई बात नही 
दिल -ए चाहत .........................................
फासले बढे तो मेरे और मेरी सासों के बीच 
वरना जिन्दगी रहे या न रहे कोई बात नही 
 दिल -ए -चाहत .....................................

Saturday, July 28, 2012

"क्या उत्तेजक परिधान महिलाओं के प्रति यौन हिंसा का कारण है ?"

 बदलते  समाज में परिधान का महत्त्व केवल तन ढकने मात्र तक नही रह गया है ।वास्तव में अब यह फैशन का रूप ले चुका है ,जिसमे बाजारवाद की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।।अब हर कोई, जिसके पास पर्याप्त संसाधनों तक पहुँच है ,वो समाज में विशिष्ट दिखना चाहता है।वैसे भी सुन्दर दिखने की चाहत हर एक की होती है ,और यह बात महिलाओं में अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा होती है ।रहा सवाल महिलाओं के प्रति यौन हिंसा ,उनके उत्तेज़क कपडे पहनने से होता है तो ऐसा  कहना हमारी राय में अतार्किक है ,क्योंकि अभी तक महिलाओं के प्रति यौन हिंसा का कारण उनका उत्तेजक परिधान कभी नही रहा है ,बल्कि सीधी- सरल महिलाऐं ,जो आमतौर पर साधारण कपडे पहनती है वो इस कुकृत्य का ज्यादा शिकार होती रही हैं ।अत : मेरा मानना है की इस तरह के अतार्किक सवाल उठाकर न केवल हम अपनी  जिम्मेदारिओं से विमुख हो रहे हैं बल्कि उन लोगो का मनोबल भी बढ़ा रहें हैं जो इस कुकृत्य को अंजाम दे रहें हैं।.............

Saturday, July 14, 2012

भटक जातें हैं जो मंजिल के रास्ते
अक्सर ! ढूढते हैं वही नये रास्ते .........

positive way

भटक जातें हैं जो मंजिल के रास्ते
अक्सर ! ढूढते हैं वही नये रास्ते .........

my view

"हमसे ज्यादातर लोगों की ईमानदारी वही तक होती है ,जहाँ तक इसके लिए हालात गवाही देता है | जैसे ही विपरीत हालत उत्पन्न होतें हैं हम ईमानदारी का दामन छोड़ कर उस रस्ते पे चलने लगते है जिसके लिए हमारा वजूद गवाही नही देता |"

Friday, February 10, 2012

छ गयी है खामोशियाँ मन की गहराइयों में !