भौतिक सपने की चाहत और फिर उसका पूरा हो जाना ही , जिन्दगी के सार्थकता को
परिभाषित नही कर सकता | जिन्दगी का दायरा इतना बड़ा है कि भौतिकता की तमाम
चीजे प्राप्त कर लेने के बाद भी बहुत कुछ खाली रह जाता है |इसी खालीपन को
जानना ,समझना और फिर उसे भरना जिन्दगी को सार्थक बनती है ............".जिन्दगी की सार्थकता "
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