भावनाएं व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा होतीं
हैं |जब ये किसी के प्रति आत्मीयता के साथ उमड़ती हैं तो ,उनको हमारा विवेक
नियंत्रित करने में नाकाम रहता है |इसका कारण यह होता है कि.जब भावनाएं
आत्मप्रेम से परिपूर्ण होतीं हैं तो वे अत्यंत सरल और पवित्र होती हैं ,जिस
कारण हमारा विवेक ,जो कि जटिलता को समझने का जरिया है ,वो हमारी इस पवित्र
आत्मप्रेम कि सरलता को समझ ही नही पाता है |यह हमारी भावना और विवेक का
अजीब विरोधाभास है |इसको समझना और इससे पार होना हमारे व्यक्तित्व के लिए
एक बड़ी चुनौती है|
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