"प्राय:हम लोग,किसी व्यक्ति या विषय को अपने अनुभव,आवश्यकता और अपनी सुविधा
के अनुपात में समझते है |यह हमारे समझ की सीमा होती है,किन्तु इस सीमा के
बाहर भी समझ की अनंत संभावनाएं होती है ,जिनको हम, या तो समझते नही है या
समझने की कोशिश ही नही करते हैं |प्राय:हम अपनी सीमित समझ के आधार पर ये
धारणा बना लेते हैं कि हमने उस व्यक्ति या विषय को सम्पूर्णता में समझ लिया
है |जब कि वास्तव में उस विषय या व्यक्ति को समझने वाले न केवल हमसे बेहतर
हो सकते हैं बल्कि हमसे भिन्न भी |वस्तुत: इस तरह कि धारणा न केवल अपूर्ण
है,बल्कि हम अपनी समझ की अनंत संभावनाओं को सीमित करते हुए अपने आपको 'कूपमंडूपकम 'की स्थिति में लेकर चले जाते हैं |""समझ की संभावनाएं "
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