विश्वास,एक आत्मनिष्ठ धारणा होती है,जिसको हम
अपनी समझ और विचारों की सीमा के आधार पर निर्मित और विकसित करते हैं |
प्राय: जब किसी के प्रति घनिष्ठ विश्वास कायम हो जाता है तो हम ये मानकर
चलतें है कि हम उसको अच्छी तरीके से समझ गये हैं |किन्तु अचानक किसी घटना
के बाद और उसके पूर्व तमाम घटनाक्रमों का अनुभव आपको यह एहसास दिलाता है कि
वो व्यक्ति ,जिस पर आप विश्वास कर रहे थे ,.वास्तव में वह आपके विश्वास का
इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा था |आप इस विश्वासघात के कारण व्यथित
हो जायेगे |किन्तु हमारी राय में ऐसा करना उचित नही है,क्योंकि ये विश्वास
आपकी अपनी समझ का प्रतिफल था,वस्तुत:आपको अपनी समझ को और परिपक्व बनाने की
तरफ ध्यान देना चाहिए |
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