'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना से विमुख होकर वैश्विक ग्राम के रूप में परिवर्तित हो रहा हमारा समाज, भौतिकवाद की अंधी दौड़ में धुल-धूसरित हो रहे हमारे नैतिक मूल्य,भूमंडलीकरण की प्रचंड लहर में गुम हो रही हमारे गावों की सांस्कृतिक पहचान ,खुद अपना ही पता पूछते हुए भटक रहें लोग , बाजारवाद का यह कैसा उत्सव जिसके पांवों तले रौंदे जा रहें हम ..............
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