आंसुओं से ख़ुशी के दीप जलाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
मंजिल सीधे रास्तों से मिलती है
इसी सोच में हर कदम बढ़ाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
इमां दुरुस्त रहने पे चोट मिलतो ज़ुरूर
इस बात से कभी न घबराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
दर्द ही देता है खुशी के मायने
इसलिए सदा दर्द को अपनाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
उलझन मे गुजारता था जिंदगी अपनी
पर दूसरों के उलझन सुलझाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
सर्वेश त्रिपाठी
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
मंजिल सीधे रास्तों से मिलती है
इसी सोच में हर कदम बढ़ाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
इमां दुरुस्त रहने पे चोट मिलतो ज़ुरूर
इस बात से कभी न घबराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
दर्द ही देता है खुशी के मायने
इसलिए सदा दर्द को अपनाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
उलझन मे गुजारता था जिंदगी अपनी
पर दूसरों के उलझन सुलझाता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
हर ग़म के दौर में भी मुस्कुराता रहा
सर्वेश त्रिपाठी
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