अधिकांश लोग साधारण जीवन के व्यवहार में स्वाभाविक तथा अचेतन रूप से भौतिकवादी होते हैं। वे ज़िंदगी के भौतिक पक्ष से भली-भांति परिचित होते हैं और अपने दैनन्दिनी कार्यकलापों में भौतिक सिंद्धांतों से परिचालित होते हैं। यह बात दीगर है कि जब जीवन से जुड़ी जिन चीज़ों में अनिश्चितता या असुरक्षा शामिल हो जाती है, तब वे पारंपरिक रूप से प्राप्त अपनी समझ के हिसाब से अध्यात्मवादी चिंतन का सहारा लेते हैं।वास्तव में जब तक व्यक्ति भौतिकता कि प्रचंड लहर में प्रवाहित होता रहता है, तब तक उसे अपनी आत्मा कि आवाज सुनाई नही देती या बहुत अस्पष्ट सुनाई देती है I
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