prakritikiyadonme.blogspot.com

Friday, October 22, 2010

अर्धांगिनी

समां जाये ऐसे जैसे मिल जाती हैं
दो धाराएं एक-दूसरे में

 मुस्कुराएँ मेरे  होंठों से उनके लिए
 हो गये हैं उदास इस जहाँ से

सुने मेरे कानो उन आहटों को
न सुन पाता है जिसे और  कोई

 देखे मेरी आँखों उस तस्वीर को
जो हो गयी  हैं धुधली अपने अस्तित्व के लिए

महसूस करे उन संवेदनाओं को
जो सुप्त हो गयी हैं इक रोटी के लिए

बढ़े मेरे कदमों से उनके लिए
 जो हो गये हैं त्रस अपनी अदृष्ट की वज़ह से

 दे मुझे वो पवित्रता की ऐसी ज्योति कि
 बना दूं अमावस की निशा को भी चांदनी
काश ऐसी हो मेरी अर्धांगिनी

No comments:

Post a Comment