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Friday, October 22, 2010

"वो औरत"

 
वो औरत ,जो करती है दिनभर
जी-तोड़ मेहनत ,ईट के भट्ठे पर
शायद माँ बनने वाली है

फिर भी ढो रही है सिर पर ईटों का भार
नहीं है परवाह उसे प्रसव पीड़ा का
क्योंकि डर है कहीं छिन न जाये
उसकी मजदूरी

एक दिन कहीं किसी कोने में
देगी जन्म बच्चे को
और पिलाएगी दूध
और फिर !
 
फटे साड़ी के चिथड़ो में लपेटकर
बोरे का झूला बनाकर
 देगी टांग बच्चे को
किसी डाल के सहारे

और फिर !
निकल पड़ेगी
अपने काम पर




सर्वेश
 

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